न्यूज़ डेस्क, पटना, बबलू कुमार।।
बिहार की राजनीति का इतिहास जब भी लिखा जाएगा, उसमें एक ऐसा अध्याय जरूर होगा जो लगातार बदलते राजनीतिक समीकरणों, गठबंधनों और सत्ता के उतार–चढ़ाव की कहानी कहेगा। उस अध्याय का केंद्र बिंदु होंगे — नीतीश कुमार।
कभी समाजवादी आंदोलन के प्रतिबद्ध कार्यकर्ता, कभी सुशासन के प्रतीक, तो कभी गठबंधन की राजनीति के सबसे कुशल रणनीतिकार। उनकी राजनीति जितनी लंबी है, उतनी ही विवादों और विरोधाभासों से भरी हुई भी है।
आंदोलन की मिट्टी से निकली राजनीति
नीतीश कुमार की राजनीति का जन्म किसी राजनीतिक परिवार में नहीं हुआ था। वे उस पीढ़ी के नेता थे, जिनकी राजनीतिक चेतना सड़कों के आंदोलन से बनी। 1970 के दशक में जब देश में व्यवस्था परिवर्तन की मांग तेज हुई, तब जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में चला जेपी मूमेंट युवाओं के लिए एक क्रांति का प्रतीक बन गया।
नीतीश कुमार भी उसी आंदोलन की उपज थे। उस समय उनके आदर्श थे राम मनोहर लोहिया और बिहार के जननायक कर्पूरी ठाकुर। उस दौर की राजनीति में विचारधारा सबसे बड़ा हथियार थी और सत्ता केवल समाज परिवर्तन का साधन मानी जाती थी।
संसद से पटना तक का सफर
1980 और 1990 के दशक में नीतीश कुमार धीरे-धीरे राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित होते गए। वे लोकसभा पहुंचे और अपनी गंभीर, अध्ययनशील और साफ छवि के कारण अलग पहचान बनाने लगे।
बाद में वे बाजपेई जी की सरकार में रेल मंत्री बने। रेल मंत्रालय में उनके कुछ फैसलों ने उन्हें एक सक्षम प्रशासक की छवि दी।
लेकिन उनकी असली परीक्षा अभी बाकी थी — बिहार की सत्ता।
2005 : उम्मीदों का नया अध्याय
साल 2005 में जब बिहार की राजनीति एक लंबे राजनीतिक संघर्ष और अस्थिरता से गुजर रही थी, तब नीतीश कुमार के नेतृत्व में सत्ता परिवर्तन हुआ। उस समय बिहार अपराध, पिछड़ेपन और प्रशासनिक विफलताओं की छवि से जूझ रहा था।
नीतीश कुमार ने सत्ता संभालते ही प्रशासनिक सुधार, कानून व्यवस्था और बुनियादी ढांचे पर जोर दिया।
गांवों तक सड़क निर्माण
छात्राओं के लिए साइकिल योजना
शिक्षा और स्वास्थ्य पर जोर
पंचायतों में महिलाओं की भागीदारी
इन कदमों ने बिहार की राजनीति में एक नई उम्मीद पैदा की। इसी दौर में जनता ने उन्हें “सुशासन बाबू” का नाम दिया।
गठबंधन की राजनीति का खेल
लेकिन बिहार की राजनीति केवल विकास योजनाओं से नहीं चलती, यहां सत्ता का गणित भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है।
नीतीश कुमार की राजनीति का सबसे विवादित पहलू रहा है — लगातार बदलते गठबंधन।
उन्होंने कभी भाजपा के साथ मिलकर सरकार चलाई, तो कभी राजद और कांग्रेस के साथ महागठबंधन बनाकर सत्ता संभाली।
राजनीति के जानकार इसे व्यावहारिक राजनीति बताते हैं। उनका कहना है कि लोकतंत्र में परिस्थितियों के अनुसार गठबंधन बदलना असामान्य नहीं है।
लेकिन आलोचक इसे सिद्धांतों से समझौता मानते हैं। उनका सवाल है —
क्या समाजवादी आंदोलन से निकले नेता की राजनीति इतनी लचीली हो सकती है कि विचारधारा ही धुंधली पड़ जाए?
समाजवाद की कमजोर होती विरासत
बिहार की राजनीति कभी समाजवादी विचारधारा की प्रयोगशाला मानी जाती थी। कर्पूरी ठाकुर, जयप्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया की सोच ने यहां की राजनीति को गहराई से प्रभावित किया था।
लेकिन आज वही समाजवादी धारा कई टुकड़ों में बंटी हुई दिखाई देती है। राजनीतिक दलों के बीच विचारधारा से ज्यादा महत्व सत्ता के समीकरणों को मिल गया है।
नीतीश कुमार को उस समाजवादी परंपरा का अंतिम बड़ा चेहरा माना जाता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या उनकी राजनीति ने उस परंपरा को मजबूत किया या धीरे-धीरे कमजोर?
सत्ता की मजबूरी या रणनीति?
नीतीश कुमार के समर्थक कहते हैं कि उन्होंने बिहार के विकास के लिए जो भी राजनीतिक फैसले लिए, वे परिस्थितियों की मजबूरी थे। उनका तर्क है कि अगर सत्ता में बने रहना है तो गठबंधन की राजनीति से समझौता करना पड़ता है।
लेकिन आलोचकों का कहना है कि राजनीति केवल सत्ता में बने रहने का नाम नहीं है। राजनीति विचारधारा और जनता के विश्वास का भी प्रश्न है।
जब एक नेता बार-बार अपने राजनीतिक साथी बदलता है, तो जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर स्थायी विचारधारा क्या है?
बिहार की राजनीति का आईना
नीतीश कुमार की राजनीति दरअसल बिहार की राजनीति का आईना भी है। यहां सामाजिक समीकरण, जातीय गणित और राजनीतिक गठबंधन – तीनों मिलकर सत्ता का रास्ता तय करते हैं।
ऐसे में कोई भी नेता पूरी तरह आदर्शवादी राजनीति नहीं कर पाता। लेकिन इतिहास का मूल्यांकन हमेशा कठोर होता है। वह केवल यह देखता है कि किसी नेता ने अपने समय में समाज और राजनीति को किस दिशा में आगे बढ़ाया।
इतिहास का फैसला अभी बाकी
नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा अभी खत्म नहीं हुई है। वे अब भी बिहार की राजनीति के सबसे अनुभवी और प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं।
लेकिन उनकी राजनीति का अंतिम मूल्यांकन इतिहास ही करेगा।
इतिहास शायद यह पूछेगा —
क्या नीतीश कुमार उस समाजवादी आंदोलन की विरासत को आगे बढ़ाने वाले नेता थे, जिसने व्यवस्था परिवर्तन का सपना देखा था?
या वे उस दौर के प्रतीक बन गए, जहां विचारधारा धीरे-धीरे सत्ता की राजनीति में विलीन हो गई?
इतना जरूर तय है कि नीतीश कुमार के बिना बिहार की राजनीति का कोई भी इतिहास अधूरा रहेगा।
उनकी कहानी संघर्ष, सत्ता, समझौते और राजनीतिक कौशल — इन सबका मिला-जुला अध्याय है।
और शायद यही कारण है कि बिहार की राजनीति में उनका नाम आज भी सबसे ज्यादा चर्चा और विवाद का विषय बना हुआ है।

