न्यूज़ डेस्क, विजय कुमार सिंह।।
हाट बाजार यानी वह साप्ताहिक ग्रामीण बाजार जहाँ किसान, कुम्हार, दस्तकार और छोटे व्यापारी एक तय दिन अपने उत्पाद बेचने इकट्ठा होते हैं। यह भारत की सबसे पुरानी जमीनी विपणन प्रणाली है।
हाट बाजार में खरीद-बिक्री के लिए सब्जी-अनाज, बर्तन, कपड़े, नकली गहने, घर-गृहस्थी का सामान, चाट-पकौड़ी सब मिलता है। यह बाजार खरीद बिक्री के साथ ही सामाजिक-सांस्कृतिक का अनुपम मिलन स्थल है। जहां त्योहार जैसा माहौल होता है।
पुराने समय में समाचार, विचार और ज्ञान के आदान-प्रदान का भी जरिया हुआ करता था। दूर-दराज से आए ग्रामीण एक दूसरे के बारे में जान पाते थे। सुख-दुख को आपस में सहयोगात्मक ढंग से जानते थे।

ग्रामीण हाट बाजार अक्सर जगह बदलता रहता है। यानी कई गांवों को मिलाकर जगह फिक्स रहता है। जहां सप्ताह के प्रत्येक दिन अलग-अलग जगह पर बाजार लगता है। जहां ग्रामीण खरीदारी करने के लिए आते हैं। इस हाट मे आम बाजार से कम कीमत पर सामान मिल जाया करता है। कम क्रय-क्षमता वाले लोगों की जीवनरेखा है। जहां सस्ते दर पर सामानों की खरीद बिक्री की जाती है। इतना ही नहीं हरे सब्जियों के मामले में यह काफी प्रसिद्ध है। जहां ताजे सब्जियां, फल-फूल के लिए लोग जरूर आते हैं।
इस बाजार में स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता ही है साथ में छोटे किसानों, दस्तकारों, छोटे व्यापारियों को सीधा ग्राहक मिलता है।
वर्तमान समय में आधुनिक मॉलों और चकाचौध करती बाजारों में भी अपने को सजीव किए हुए ग्रामीण हाट सुविधाओं से वंचित है। पहले की तरह ही आज भी खुले मैदान में सड़क के किनारे यह बाजार लगता आ रहा है। मौजूदा हाल और सरकारी पहल की आवश्यकता है।
कई जगह शेड, शौचालय, पीने के पानी जैसी सुविधा नहीं है। आंधी-बारिश में किसानों, व्यापारियों को खुले में बैठना पड़ता है।
इस ओर बिहार सरकार का ध्यान गया है। आधुनिकीकरण के लिए बिहार में 725 आधुनिक हाट-बाजार बन रहे हैं। जिसमें चबूतरे, शेड, जीविका दीदियों के लिए पक्की दुकानें, ई-नाम से जोड़ने की योजना पर पहल की जा रही है। इस तरह का योजना धरातल पर उतरने के बाद ग्रामीण हाट की सूरत और सेहत दोनों बदल जाएगी। जहां कुछ स्थाई दुकानें हो जाएगी। वही साप्ताहिक बाजार का रौनक और बढ़ जाएगा। कुछ जगह नगर पालिका हाइवे किनारे लगने वाले हाट को सुरक्षित मैदानों में शिफ्ट कर रही है। ग्राम सभा भी प्रबंधन कर रही है।
बिहार सहित देश के कई प्रांतों में हाट बाजार का प्रचलन पुराने जमाने से है। भगोरिया हाट, MP में आदिवासी युवक-युवतियाँ पारंपरिक वेशभूषा में आते हैं, यह सप्ताहभर चलता है।
चौदह तारीख मेला, आबूरोड में यह महीने में 1 बार लगता है, जहां गुजरात-राजस्थान के व्यापारी आते हैं। इसी तरह देश के कोने कोने में हाट बाजार का प्रचलन और नाम अलग-अलग है।

हाट बाजार सिर्फ खरीद-बिक्री की जगह नहीं, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और संस्कृति का दिल है। सरकार अब इन्हें बुनियादी सुविधाओं से जोड़कर स्थायी आजीविका का केंद्र बना रही है। हाट बाजार गाँव का “मॉल” है। यहाँ जरूरत की हर छोटी-बड़ी चीज मिल जाती है। किसान से लेकर कुम्हार, दस्तकार, व्यापारी सब अपना माल लेकर आते हैं।
हाट बाजार में बिकने वाले मुख्य सामानो में
कृषि उत्पाद सब्जी-फल आलू, प्याज, टमाटर, मौसमी सब्जियाँ, केला, आम आदि है। वही अनाज-दाल में गेहूँ, चावल, मक्का, अरहर, चना। मसाले में हल्दी, मिर्च, धनिया, जीरा आदि मिलते हैं।
इस बाजार में घर-गृहस्थी का सामान मिट्टी के बर्तन में घड़ा, दीया, कुल्हड़, तवा के साथ ही बांस-बेंत की टोकरी, सूप, डलिया, झाड़ू मिलता है।
लोहे के औजार में खुरपी, हँसिया, कुदाल, तवा तथा
कपड़ा और श्रृंगार में साड़ी, लुंगी, गमछा, बच्चों के रेडीमेड कपड़े, चांदी के गहनाे में
पायल, बिछिया, हँसली, बिंदी, चूड़ी, कान की बाली, माला आदि मिलते हैं।
खाने-पीने की चीजें भी मिलती हैं जिसमें
चाट-पकौड़ी, समोसा, जलेबी, चना-घुघनी, गुड़, सत्तू, चूड़ा, मुरमुरा, अचार, मांस-मछली, देसी मुर्गा, बकरी, ताजी मछली भी बिकती है।
कई जगह बड़ी हाट भी लगती है जिसमें पशु और अन्य सामान मिलते हैं। जिसमें बकरी, मुर्गी, गाय-भैंस, घोड़ा बैल भी मिलता है।
दैनिक जरूरत के समानों में साबुन, तेल, बीड़ी, माचिस, प्लास्टिक का सामान, दवाई-जड़ी बूटी, देसी दवा, नीम-तुलसी आदि मिलते हैं।
हाट में किसान अपनी फसल, कुम्हार अपने बर्तन, और दुकानदार शहर का सामान लाकर बेचता है। इसलिए एक ही जगह पूरे हफ्ते का राशन, कपड़ा और मनोरंजन सब मिल जाता है।

