न्यूज़ डेस्क, बबलू कुमार।।
@ टूटे हुए पैर को डॉक्टर ने प्लास्टर की जगह कागज-कूट बांधकर रोगी को किया रेफर
@ हुलासगंज सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र का है मामला, तूल पकड़ने पर जिला प्रशासन ने मांगा जवाब
जहानाबाद जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने अस्पताल की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सड़क हादसे में घायल दो युवकों के पैर में फ्रैक्चर होने के बाद प्लास्टर या चिकित्सकीय स्लैब लगाने के बजाय कार्टन के गत्ते और कागज के सहारे पैर बांधकर उन्हें पीएमसीएच रेफर किए जाने का मामला सामने आया है। घटना की तस्वीरें और मामला सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद स्वास्थ्य महकमे में हलचल तेज हो गई। बताया जाता है कि 10 सितंबर को हुलास गंज क्षेत्र में दो मोटर साइकिलों की आमने-सामने की टक्कर में चार युवक घायल हुए थे। इनमें दो युवकों के पैर में गंभीर चोट और फ्रैक्चर की बात सामने आई, घटना हुलास गंज थाना क्षेत्र के धर्मपुर मोड़ के पास का घटना है। बता दे कि दो मोटर साइकिल आपस में सामने से लड़ने से जिसमें धरमपुर गांव के निवासी 16 वर्षीय राजकुमार को गंभीर चोट लगने के कारण प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हुलासगंज
लाया गया। आरोप है कि हुलासगंज सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में प्राथमिक उपचार के दौरान टूटे पैर पर चिकित्सकीय प्लास्टर या उचित स्लैब के बजाय कागज/कार्टन जैसी सामग्री का इस्तेमाल किया गया और घायलों को जहानाबाद सदर अस्पताल भेज दिया गया।

सबसे गंभीर सवाल इसके बाद सदर अस्पताल की व्यवस्था को लेकर खड़ा हुआ। आरोप है कि यहां भी घायलों के पैर का समुचित प्लास्टर या स्लैब लगाने के बजाय उन्हें पीएमसीएच रेफर कर दिया गया। इस पूरे मामले ने जिला अस्पताल में उपलब्ध बुनियादी चिकित्सा सुविधाओं और डॉक्टरों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
*सोशल मीडिया पर तस्वीर सामने आने के बाद मचा हड़कंप*
मामले ने उस समय और तूल पकड़ लिया जब नेता प्रतिपक्ष एवं पूर्व स्वास्थ्य मंत्री तेजस्वी यादव ने घायल युवकों की तस्वीर सोशल मीडिया पर साझा करते हुए बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल उठाए। उन्होंने जिला अस्पताल में प्लास्टर जैसी बुनियादी सुविधा उपलब्ध नहीं होने को लेकर सरकार पर निशाना साधा।
मामले की जानकारी स्वास्थ्य विभाग के स्तर तक पहुंचने के बाद विभागीय स्तर पर संज्ञान लिए जाने की बात सामने आई है। इसके बाद जहानाबाद के जिलाधिकारी छिरिंग वाई भूटिया ने सिविल सर्जन, सदर अस्पताल अधीक्षक और डीपीएम से मामले में जवाब मांगा है।
*स्वास्थ्य विभाग के दावों और अस्पताल की तस्वीर में अंतर?*
बिहार सरकार की ओर से लगातार जिला अस्पतालों को मजबूत करने, मरीजों को स्थानीय स्तर पर बेहतर इलाज उपलब्ध कराने और अनावश्यक रेफरल पर रोक लगाने की बात कही जाती रही है। ऐसे में जहानाबाद सदर अस्पताल से सामने आया यह मामला स्वास्थ्य व्यवस्था के दावों की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़ा करता है।
यदि जिला सदर अस्पताल में फ्रैक्चर मरीज को आवश्यक प्राथमिक उपचार और प्लास्टर की सुविधा उपलब्ध नहीं कराई जाती और सीधे उच्च संस्थान भेज दिया जाता है, तो यह व्यवस्था की क्षमता पर गंभीर प्रश्न है। हालांकि, पूरे मामले की वास्तविक स्थिति जांच और संबंधित अधिकारियों की रिपोर्ट आने के बाद ही स्पष्ट होगी।

*इमरजेंसी ड्यूटी को लेकर भी उठे रहे हैं सवाल*
सदर अस्पताल की व्यवस्था को लेकर स्थानीय स्तर पर एक और गंभीर आरोप सामने आया है। आरोप है कि इमरजेंसी ड्यूटी में निर्धारित संख्या में चिकित्सकों की मौजूदगी नहीं रहती और कई बार तीन डॉक्टरों की जगह महज एक डॉक्टर के भरोसे काम चलने की शिकायत मिलती है।
यदि यह आरोप जांच में सही पाया जाता है तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि आपातकालीन मरीजों की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय होगा। सड़क हादसे, गंभीर चोट और अन्य आपात स्थिति में अस्पताल की इमरजेंसी में चिकित्सकों की पर्याप्त उपलब्धता बेहद जरूरी है।
*सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कार्रवाई की मांग की*
मामला सामने आने के बाद स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं ने स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन से पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि घायलों के पैर पर वास्तव में प्लास्टर या आवश्यक चिकित्सकीय स्लैब लगाने के बजाय गत्ते का इस्तेमाल किया गया और इलाज के बजाय केवल रेफर किया गया, तो इसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
सामाजिक कार्यकर्ताओं ने यह भी मांग की है कि अस्पताल की इमरजेंसी में डॉक्टरों की उपस्थिति, ड्यूटी रोस्टर, मरीजों को रेफर किए जाने के कारण और फ्रैक्चर मरीजों को उपलब्ध कराई जाने वाली सुविधाओं की जांच कराई जाए।


