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भोजपुर जिले के गड़हनी में जन शायर राहत इंदौरी की याद में श्रद्धांजली सभा का आयोजन जन संस्कृति मंच ने किया

भोजपुर(गड़हनी) ::–

बबलू कुमार ::–

12 अगस्त 2020 बुधवार

भोजपुर जिले के गड़हनी में जन शायर राहत इंदौरी की याद में श्रद्धांजली सभा का आयोजन जन संस्कृति मंच (जसम) की ओर से किया गया।

राहत इंदौरी साहेब की तस्वीर पर श्रद्धांजली सभा में भाकपा-माले के केन्द्रीय कमिटी सदस्य सह इनौस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मनोज मंजिल , जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय परिषद् सदस्य जनकवि निर्मोही , भाकपा-माले के राज्य कमिटी सदस्य सह गड़हनी के सचिव नवीन कुमार , संस्कृतिकर्मी अमीन भारती , शाहीन बाग संचालक जफर , इनौस के साथी आनंद , अमित , अरशद सहित दर्जनों नागरिकों व युवाओं ने पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजली दी।

श्रद्धांजली सभा के दौरान दो मिनट का मौन आयोजित किया गया और तमाम लोगों ने पुष्पांजली अर्पित किया। श्रद्धांजली के कार्यक्रम का संचालन युवा साथी आनंद कुमार ने किया।

श्रद्धांजली के मौके पर मनोज मंजिल ने कहा कि सुविख्यात शायर राहत इंदौरी की कोरोना संक्रमण से हुई मौत, देश की साझी संस्कृति और हिंदुस्तानी साहित्य के लिए बहुत बड़ी क्षति है। उन्होंने श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि इस वक्त जब इस मुल्क में सदियों पुराने भाईचारे को धार्मिक-सांप्रदायिक फासीवादी राजनीति लगातार तोड़ रही है, तब उसके खिलाफ राहत साहब अपनी शायरी के जरिए कौमी एकता और आम अवाम के पक्ष में ताकतवर तरीके से आवाज बुलंद कर रहे थे।

सांप्रदायिक फासीवादी जहर और व्यवस्थाजन्य त्रासदियों के खिलाफ संघर्ष करने वाले या बदलाव चाहने वाले तमाम लोगों के वे महबूब शायर थे। नागरिकता संबंधी कानूनों के खिलाफ जो आंदोलन पूरे देश में उभरा था, उसे भी राहत साहब की शायरी से मदद मिल रही थी। उन्होंने गजल में सेकुलर-जनतांत्रिक तर्कों को जगह दी और जिसके कारण उनकी रचनाएं आम अवाम के लोकतांत्रिक-संवैधानिक हक-अधिकार के संघर्ष से जुड़ी हैं।
जनकवि निर्मोही ने कहा कि 1 जनवरी 1950 को जन्में राहत इंदौरी की लोकप्रियता हाल के वर्षो में और तेजी से बढ़ी थी। उनका शेर ‘सभी का खून है शामिल यहां की मिट्टी में/ किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है’ एकाधिकारवादी, सांप्रदायिक-वर्णवादी राष्ट्र की परिकल्पना के खिलाफ आम अवाम के राष्ट्र की अवधारणा के तौर पर मकबूल है। इसी गजल के दो और शेर गौर करने के काबिल हैं-

मैं जानता हूँ के दुश्मन भी कम नहीं लेकिन / हमारी तरहा हथेली पे जान थोड़ी है…
जो आज साहिबे मसनद हैं कल नहीं होंगे/ किराएदार हैं जाती मकान थोड़ी है।

हिंदुस्तानी अकलियतों की पीड़ा और संकल्प भी उनकी शायरी की खासियत है। उन्होंने लिखा है- अब के जो फैसला होगा वह यहीं पे होगा/ हमसे अब दूसरी हिजरत नहीं होने वाली।
‘धूप-धूप’ और ‘नाराज’ राहत साहब के दो प्रकाशित गजल संग्रह हैं।

संस्कृतिकर्मी अमीन भारती ने कहा कि मौत से उन्हें कोई खौफ नहीं था। वे एक जिंदादिल शायर थे। उनकी जिंदादिली और उनका संघर्षशील मिजाज आने वाले वक्त में भी हमें रोशनी दिखाता रहेगा। बकौल राहत साहब-
एक ही नदी के हैं ये दो किनारे दोस्तो / दोस्ताना जिंदगी से, मौत से यारी रखो।

श्रद्धांजली के मौके पर वरिष्ठ नागरिक हैदर जी , कादिर जी , किसान नेता वासुदेव सिंह , निक्कू अली , असलूब , अल्ताफ जी , तसव्वुर , सिक्का उर्फ अफजल , विकास भी मौजूद रहे।

By National News Today

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